वर्मीकम्पोस्ट (केंचुआ खाद) बनाने की विधि

वर्मी कम्पोस्ट बनाने की विधि - यहाँ जानें Vermicompost खाद की मेथड!

किसान भाइयों आप को बता दे की हम वर्मीकम्पोस्ट (Vermicompost) को केंचुआ खाद के नाम से भी जानते है।  आपको बता दे की यह पोषण पदार्थों से भरपूर एक उत्तम जैव उर्वरक है। यह केंचुआ आदि कीड़ों के द्वारा वनस्पतियों एवं भोजन के कचरे आदि को विघटित करके बनाई जाती है। 

केंचुआ कृषकों का मित्र एवं 'भूमि की आंत' कहा जाता है। यह सेन्द्रिय पदार्थ (ऑर्गैनिक पदार्थ), ह्यूमस व मिट्टी को एकसार करके जमीन के अन्दर अन्य परतों में फैलाता है इससे जमीन पोली होती है व हवा का आवागमन बढ़ जाता है, तथा जलधारण की क्षमता भी बढ़ जाती है। केचुँए के पेट में जो रासायनिक क्रिया व सूक्ष्म जीवाणुओं की क्रिया होती है, उससे भूमि में पाये जाने वाले नत्रजन, स्फुर (फॉस्फोरस), पोटाश, कैलशियम व अन्य सूक्ष्म तत्वों की उपलब्धता बढ़ती है। ऐसा पाया गया है कि मिट्टी में नत्रजन 7 गुना, फास्फोरस 11 गुना और पोटाश 14 गुना बढ़ता है। 

वर्मीकम्पोस्ट तैयार करने के लिए वर्मी को भोज्य पदार्थ की आवश्यकता होती है जिसे वर्मीकम्पोस्ट का कच्चा माल कहा जाता है। जैसे - 

  1. सूखा गोबर
  2. गीला गोबर
  3. सूखी पत्तियां
  4. फसल के अवशेष
  5. रसोई से निकलने वाला कचरा जैसे सब्जियों के टुकड़े, अनाज इत्यादि।
  6. बगीचे से निकलने वाला कचरा जैसे फूल, पत्तियाँ इत्यादि।

वर्मीकम्पोस्ट तैयार करने की विधि - 

  • पाट विधि (पात्र विधि) - पात्र विधि में एक ‘वी’ आकार का पात्र लिया जाता है यह पात्र लकड़ी की पेटी, प्लास्टिक की बाल्ल्टी या सीमेंट की टंकी हो सकती है। इस पात्र के निचले हिस्से में एक छेद होता है जिससे दिया गया अधिक पानी बाहर निकल जाता है। इस पात्र के निचले हिस्से में बजरी और कचरे की एक परत बिछा दी जाती है इस बजरी पर घर से निकलने वाला कचरे की परतें डाली जाती है जब कचरे से पात्र पूरी तरह भर जाता है तो इसकी ऊपरी सतह पर केंचुए डाल दिये जाते हैं एवं प्रतिदिन पानी सींचा जाता है। इस तरह एक पात्र में कम्पोस्ट बनकर तैयार हो जाती है।
  • सरफेश विधि (सतही विधि) - सरफेश विधि एक व्यवसायिक विधि है जिसमें अधिक मात्रा में कम्पोस्ट तैयार किया जाता है। इस विधि के द्वारा कम्पोस्ट तैयार करने को निम्न चरणों में बांटा जा सकता है।

प्रथम चरण – इस चरण में तैयार किये गये गड्ढे के ऊपर सूखी घास या नारियल के छिलकों का प्रयोग किया जाता है गड्ढों में चारों ओर सूखी घास या नारियल के छिलकों को बिछाली के रूप में बिछा दिया जाता है।
द्वितीय चरण– इस चरण में एक सप्ताह का सूखा गोबर और सूखी पत्तियों को साथ मिलाकर बेड बना दी जाती है।
तृतीय चरण– तैयार बेड के ऊपर ताजा गोबर डाला जाता है और इस पर केंचुए छोड़ दिये जाते हैं।
चतुर्थ चरण – इस चरण में तैयार की गई बेड पर बोरों की फट्टियों को बिछा दिया जाता है और पानी चला दिया जाता है।

इस बेड पर प्रतिदिन सिंचाई की जाती है। कम्पोस्ट तैयार होने पर 6-7 दिन पहले से सिंचाई बंद कर दी जाती है। 30 से 45 दिनों में वर्मीकम्पोस्ट बन कर तैयार हो जाती है।

वर्मी कम्पोस्ट (Vermicompost ) केंचुआ खाद के उपयोग और लाभ 

  1. यह भूमि की उर्वरकता, वातायनता को तो बढ़ाता ही हैं, साथ ही भूमि की जल सोखने की क्षमता में भी वृद्धि करता हैं।
  2. वर्मी कम्पोस्ट वाली भूमि में खरपतवार कम उगते हैं तथा पौधों में रोग कम लगते हैं।
  3. वर्मी कम्पोस्ट का उपयोग करने वाले खेतों में अलग अलग फसलों के उत्पादन में 25-30% तक की वृद्धि हो सकती हैं।
  4. वर्मी कम्पोस्ट युक्त मिट्टी में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश का अनुपात 5:8:11 होता हैं अतः फसलों को पर्याप्त पोषक तत्व सरलता से उपलब्ध हो जाते हैं।
  5. वर्मी कम्पोस्ट मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की वृद्धि करता हैं तथा भूमि में जैविक क्रियाओं को निरंतरता प्रदान करता हैं।
  6. इसका प्रयोग करने से भूमि उपजाऊ एवं भुरभुरी बनती हैं।
  7. यह खेत में दीमक एवं अन्य हानिकारक कीटों को नष्ट कर देता हैं। इससे कीटनाशक की लागत में कमी आती हैं।
  8. इसके उपयोग के बाद 2-3 फसलों तक पोषक तत्वों की उपलब्धता बनी रहती हैं।
  9. मिट्टी में केचुओं की सक्रियता के कारण पौधों की जड़ों के लिए उचित वातावरण बना रहता हैं, जिससे उनका सही विकास होता हैं।
  10. यह कचरा, गोबर तथा फसल अवशेषों से तैयार किया जाता हैं, जिससे पर्यावरण प्रदूषित नहीं होता हैं।

वर्मी कम्पोस्ट (Vermicompost ) केंचुआ खाद बनाते समय ध्यान देने योग्य बातें - 

  1. इस खाद को तैयार करने में प्रक्रिया स्थापित हो जाने के बाद एक से डेढ़ माह का समय लगता है।
  2. प्रत्येक माह एक टन खाद प्राप्त करने हेतु 100 वर्गफुट आकार की नर्सरी बेड पर्याप्त होती है।
  3. केचुँआ खाद की केवल 2 टन मात्रा प्रति हैक्टेयर आवश्यक है।
  4. आद्रता – कम्पोस्ट तैयार करने के लिए आर्द्रता आवश्यकता होती है क्योंकि केंचुए नम स्थान पर ही रहते हैं। केंचुए को अपने जीवन संबंधी क्रियाओं के संचालन हेतु पानी को आवश्यकता अधिक होती है इसलिए प्रतिदिन तैयार शेड पर सिंचाई करना आवश्यक होता है।
  5. तापक्रम – केंचुओं के लिए 10-40 डिग्री सेल्सियस तापक्रम उपयुक्त होता है। तापक्रम यदि अधिक होने लगता है तो तापक्रम के नियंत्रण हेतु शेड के चारों ओर बोरों को काट कर लटका दिया जाता है व इन बोरों को पानी से गीला कर दिया जाता है।
  6. वातन(वायु संचारण) – केंचुए के विकास व वृद्धि के लिए वातन आवश्यक है वातन अच्छी तरह से हो इसके लिए बेड़ तैयार करते समय सर्वप्रथम सूखी घास एवं नारियल के छिलकों का प्रयोग किया जाता है और शेड को चारों ओर से खुला रखा जाता है।
  7. कीट नियंत्रण – कम्पोस्ट तैयार करने वाले स्थान को चीटियों व दीमक से मुक्त रखने के लिए गड्ढे को 1 माह पूर्व कौटनाशकों से उपचारित किया जाता है।
  8. छाया करना – कम्पोस्ट तैयार करते समय छाया की पूर्ण व्यवस्था की जाती है।
  9. सुरक्षा – पशु व पक्षियों से सुरक्षा हेतु शेड के चारो ओर तारो की फेन्सिंग या बाड़ लगाना आवशयक होता है।

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